अमानक वर्ण

अमानक वर्ण  Hindi grammar questions for competitive exam part-5




1  शुद्ध वर्तनी    2 . अमानक वर्ण 

 (i)  -शुद्ध वर्तनी ➨ बर्तन की शुद्ध " वर्तनी " क्या है ?
बर्तन का शुद्ध वर्तनी ➨ "बर्तन " का शुद्ध वर्तनी   "बरतन "है ∣

  (ii) . अमानक वर्ण - हिंदी में बहुत से ऐसे वर्ण हुआ करते थे ,जो की वर्तमान समय में चलन में नहीं है ,अथवा हिंदी के मूल वर्णो में शामिल नहीं है।  इस प्रकार के  सभी वर्ण " अमानक वर्णो " की श्रेणी में  आते हैं Ι
 अर्थात वे   " वर्ण " जो पूर्व में तो मान्य रहे हो ,परन्तु वर्तमान वर्णमाला के दृस्टीकोण   से मान्य न  होते हो , अमानक वर्ण है ।
अमानक वर्ण क्या है ➨ ऐसे वर्ण जिनका कोई " मानक " न हो , तथा जो सर्वमान्य न हो " अमानक " वर्ण है , अथवा ऐसे वर्ण जिनका पहले तो मानक रहा हो परन्तु वर्तमान समय में उनका कोई " मानक " न  हो अमानक वर्ण कहलाते है ।

अमानक वर्ण किसे  कहते है ➨ जब कोई वर्ण वर्तमान परिपेक्ष्य  के मानकों  पर खरा नहीं उतरता अथवा वर्तमान में स्वीकार वर्णमाला में शामिल न  हो , अथवा पूर्व में स्वी…

Child Development And Pedagogy Notes In Hindi

Child Development And Pedagogy Notes In Hindi

Child Development And Pedagogy Notes In Hindi
Part-4

1- भाषायी विकास -  बालक की " भाषा " का विकास होना , बालक की मानसिक योग्यता का ही भाग है।  बालक में भाषा के विकास की प्रक्रिया उसके बचपन से जन्म लेने के पश्चात ही प्रारम्भ हो जाती है।  बालक जब से जन्म लेता है , तब से वह भाषा को सीखना प्रारम्भ कर देता है। बालक के ये सभी प्रयास अलग - अलग  रूपों में चलते रहते है। बालक द्वारा भषा सीखने के विभिन्न प्रयास हो सकते है।
Child Development And Pedagogy Notes In Hindi
बालक के शब्दों के ज्ञान के विभिन्न चरण 
(i )  जन्म से 8 माह - बालक को जन्म से 8 माह तक के समयकाल में  किसी भी शब्द की जानकारी नहीं होती है। 
(ii ) बालक 9  माह से 12 के बीच के समयकाल में वह (तीन - चार) 3 -4  शब्दों को समझने लगता है। 

(iii )  बालक को लगभग  "डेड़ वर्ष " के भीतर (10 -12 ) दस से बारह शब्दों की जानकारी हो जाती है। 
Child Development And Pedagogy Notes In Hindi
(iv ) बालक को " दो - वर्ष " (2 ) की आयु तक लगभग - 200 से अधिक शब्दों की जानकारी हो जाती है। 

(v ) बालक - "तीन वर्ष " के अंदर लगभग - " 1000 " (एक - हजार ) शब्दों को समझने लगता है। 

(vi ) बालक - सोलह वर्ष की आयु तक लगभग - " 1 लाख " शब्दों को समझने लगता है। 

2 -  भाषा सीखने के विभिन्न प्रयास 

(i )  मौखिक अभिव्यक्ति - इसके अन्तर्गत बालक अपनी बात को बोलकर  अभिव्यक्त करता है। 
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 बालक की मौखिक अभिव्यक्ति से हम पता लगा सकते है, कि  उस बालक का " भाषायी विकास " किस स्तर पर हुआ है। एक बालक अपनी मौखिक अभिव्यक्ति के द्वारा ही अपने भाषायी ज्ञान से परिचित करा सकता है। 

(ii ) सांकेतिक अभिव्यक्ति - सांकेतिक अभिव्यक्ति वह " अभिव्यक्ति " होती है।
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  जिसमे बालक अपनी बात को कहने के लिए किसी " संकेत " का प्रयोग करता है।  अर्थात जब बालक अपनी बात को किसी "संकेत " द्वारा कहता है , तो वह उस बालक की - "सांकेतिक अभिव्यक्ति " कहलाती है।  
जैसे कि  - उंगली के इसारे से यहाँ - वहां जाने के लिए कहना। 



(iii ) लिखित अभिव्यक्ति - लिखित अभिव्यक्ति वह अभिव्यक्ति होती है।
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  जिसमे बालक अपनी बात को लिखकर प्रकट करता है।  लिखित अभियक्ति के लिए बालक को लिखने का ज्ञान होना आवश्यक होता है। 
3-शिक्षक को भाषायी विकास का ज्ञान - किसी भी शिक्षक को " भाषा " के विकास का पूर्ण ज्ञान होना अतिआवश्यक अथवा अनिवार्य होता है।
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  कियोकि इसी के साथ ही एक  शिक्षक किसी बालक के समस्याओं का समाधान कर सकता है।  जैसा कि - हम जानते है कि बालको को भाषा से सम्बंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, किंतु यदि किसी शिक्षक को बालक की इस भाषायी समस्या से सम्बंधित ज्ञान नहीं होगा , तो वह उन समस्यों को हल नहीं कर पायेगा। 
(i ) तुतलाना / हकलाना - कुछ बालको में हम देखते है ,कि  -  तुतला कर बोलना और हकलाना भी एक समस्या होती है।
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 जिसके विभिन्न  कारण  हो सकते है। बालको का "तुतलाकर " बोलना एक तरह का वाणी दोष होता है।  अतः  शिक्षक को चाहिए कि ऐसे बालको को "स्पस्ट " बोलने के लिए प्रेरित करे अथवा कोई अन्य उपचारात्मक शिक्षण प्रक्रिया पर बल दे।  परन्तु ये तभी संभव है जब कि - किसी शिक्षक को इस विषय में ज्ञान हो। 

सामाजिक विकास 
 →सामाजिक  विकास - सामाजिक विकास वह विकास होता है।  जिसमे बालक में दूसरो के साथ समायोजन करने की योग्यता का विकास हो।  दूसरे शब्दों में कहे तो - " स्वयं व दूसरों के साथ समायोजन करने की योग्यता सामजिक विकास कहलाता है। "
Child Development And Pedagogy Notes In Hindi
→ किसी बालक का सामाजिक - विकास उसके जन्म के साथ ही साथ प्रारम्भ हो जाता है।
→ सामाजिक विकास के अंतगर्त - सामाजिक मान्यताओं , रीति - रिवाजो , सामजिक -वातावरण आदि बालक के विकास में योगदान देते है , अथवा किसी बालक के विकास को "प्रभावित " करते है।

सांवेगिक विकास 
➨ सांवेगिक विकास अर्थात बालक के " संवेगो का विकास " होना।  किसी भी बालक के "सर्वागींण विकास " हेतु  उस बालक का - " सांवेगिक विकास " अति आवश्यक होता है।  कियोकि यदि किसी बालक के संवेगो का पूर्ण विकास न हो , तो इसका असर उस बालक के " संपूर्ण - विकास " पर पड़ता है।
Bal Vikas Shiksha Shastra Notes
➨ सांवेगिक विकास के अंतरगर्त - " भय , क्रोध , घृणा , आश्चर्य , स्नेह , विषाद आदि आते है। 
➨ सांवेगिक विकास पर सर्वाधिक प्रभाव - बालक के पारिवारिक वातावरण का होता है। 
fact 
➤ " पूर्व - प्राथमिक " शिक्षा को ग्रहण करने के लिए उपयुक्त आयु - (2 - 6 ) दो वर्ष से छै वर्ष होती है।  
➤ विकास की सबसे जटिल या कठिन या तूफानी अवस्था - बालक की " किशोरावस्था " होती है। 
➤ नाक - आँख - और जीभ इन तीनो को  मानव की "ज्ञानिन्द्रियों " में शामिल किया जाता है। 
➤ जब बालक में किसी समस्या को निजी स्तर पर हल करने की योग्यता विकसित हो जाए तो उससे हम विकास की दृस्टि से - " संज्ञानात्मक विकास " के अंतरगर्त शामिल करेंगे। 
➤ उच्च प्राथमिक स्तर की बालक की निम्नलिखित विशेषताए  है। 
(i ) काम में शीघ्रता। 
(ii ) व्यवहार का प्रदर्शन ( अलग - अलग रूपों में )
विकास के सिद्धांत 

(i ) निरंतरता का सिद्धांत -  " निरंतरता के सिद्धांत " के अंतरगर्त - " विकास " एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया बालक के जन्म से मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है। अर्थात विकास एक ऐसी प्रक्रिया है , जो कि जन्म से मृत्यु तक बिना रुके निरंतर चलती रहती है।
Bal Vikas Shiksha Shastra Notes

इस सिद्धांत के अंतरगर्त - 
⟶;बालक का शारीरिक विकास , मानसिक विकास , सामाजिक विकास आदि सभी को शामिल किया जाता है।
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अर्थात किसी भी बालक के ये सभी विकास जिसमे - शारीरिक विकास , मानसिक विकास , सामजिक विकास आदि आते है।
Introduction to Child Development
 वे सभी विकास के इसी " निरंतरता " के गुण के कारण निरंतर बिना रुके चलते रहते है।


(2  ) वैयक्तिक अंतर का सिद्धांत -   इसके अंतरगर्त हम देखते है कि - बालको के विकास और वृद्धि उनके व्यक्तिगत कारणों द्वारा होती है।  साथ ही इस सिद्धांत के  विभिन्न आयाम इस प्रकार है।
Child Development And Pedagogy

(i ) इस सिद्धांत के अनुसार बालको में विकास और वृद्धि उनके स्वयं के व्यक्तिगत कारण द्वारा होती है।
Introduction to Child Development

(ii ) इस सिद्धांत के कारण ही सभी बालको में विभिन्न प्रकार की भिन्नताओ को देखा जा सकता है।  अर्थात इस सिद्धांत के कारण ही सभी बालको का विकास एक सा या एक जैसा कभी नहीं होता है।  उनके विकास में सदैव भिन्नताएं पायी जाती है।  जिसका कारण यही सिद्धांत होता है।
Bal Vikas Most Important Question and Answer in Hindi

(iii )  विकास के इस सिद्धांत के काऱण कोई बालक - मेधावी होता है।  वही दूसरी और कोई बालक - सामन्य या पिछड़ा होता है।
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अतः  किसी भी शिक्षक को उपचारात्मक शिक्षण करने एवं शिक्षण करने से पूर्व यह ज्ञान अवश्य होना चाहिए , जिससे की वह बालको को उसी आधार पर व्यवहार कर सके।  यह आपने आप में महवपूर्ण है। 

(3  ) एकरूपता  का सिद्धांत - इस सिद्धांत के अनुसार विकास के विभिन्न रूपों में अंतर होने के वावजूद भी कुछ सिद्धांतो में "एकता " पायी जाती है।  जो की इस प्रकार से है। 
(i ) एक परिवार के सदस्य - एक परिवार के सदस्य होने पर उनमे एक विभिन्न प्रकार की समानता देखने को मिलती हैं।  ये समानता की भी प्रकार अथवा रूप में हो सकती है।


बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र

(ii ) जैसे कि  सभी मनुष्यो की वृद्धि " सिर से पाँव " की ओर होना।  अर्थात मानव के शरीर की संरचना में पहले - मानव का सिर बनता है।
Bal Vikas Shiksha Shastra Notes

.फिर धीरे - धीरे नीचे का हिस्सा और अंत में पैर बनते है।  मानव विकास की यह प्रक्रिया सभी मानवो में एक- समान या एक ही जैसी होती है।  अतः  विकास की इस प्रक्रिया को हम "एकरूपता " के सिद्धांत के अंतरगर्त रखते है।

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