अमानक वर्ण

अमानक वर्ण   Hindi grammar questions  for competitive exam  part-5   1  शुद्ध वर्तनी    2 . अमानक वर्ण   (i)  - शुद्ध वर्तनी ➨ बर्तन की शुद्ध " वर्तनी " क्या है ?   बर्तन का शुद्ध वर्तनी ➨ "बर्तन " का शुद्ध वर्तनी   "बरतन " है ∣   (ii) . अमानक वर्ण - हिंदी में बहुत से ऐसे वर्ण हुआ करते थे ,जो की वर्तमान समय में चलन में नहीं है ,अथवा हिंदी के मूल वर्णो में शामिल नहीं है।  इस प्रकार के  सभी वर्ण " अमानक वर्णो " की श्रेणी में  आते हैं Ι  अर्थात वे   " वर्ण " जो पूर्व में तो मान्य रहे हो ,परन्तु वर्तमान वर्णमाला के दृस्टीकोण   से मान्य न  होते हो , अमानक वर्ण है ।     अमानक वर्ण क्या है ➨ ऐसे वर्ण जिनका कोई " मानक " न हो , तथा जो सर्वमान्य न हो " अमानक " वर्ण है , अथवा ऐसे वर्ण जिनका पहले तो मानक रहा हो परन्तु वर्तमान समय में उनका कोई " मानक " न  हो अमानक वर्ण कहलाते है ।   अमानक वर्ण किसे  कहते है ➨ जब कोई वर्ण वर्तमान परिपेक्ष्य  के मानकों  पर खरा नहीं उतरता अथवा

child development and pedagogy notes in hindi

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Part-2



वर्तमान समय में मानव के विकास की अवस्थाओं को अधिकतम विद्वानों ने जो स्पष्टीकरण किया है , उसमे  मोटे  तौर  पर  उन्होंने चार (4 ) प्रमुख अवस्थाओं पर बल दिया है। जिसमे कि - शैशव  अवस्था , बाल्यावस्था , किशोरावस्था , वयस्कावस्था।  इसके अलावा सभी " मनोविज्ञानिकों " ने अपने हिसाब से " व्यक्तिगत तौर " पर भी इस सम्बन्ध में अलग - अलग परिभाषाये दी है।  
परन्तु  यहां हम उन 4 प्रमुख अवस्थाये का वर्णन कर रहे है। 

शिक्षा मनोविज्ञान - शिक्षा मनोविज्ञान को " तीन " प्रमुख अवस्थाओं में शामिल किया जाता है। 
जो कि इस प्रकार है - शैशवावस्था , बाल्यावस्था , किशोरावस्था । अतः " शिक्षा " की दृस्टि से ये 3 प्रमुख अवस्थाये महत्वपूर्ण है। 

1 - शैशवावस्था -  " शैशवावस्था " का समयकाल - " जन्म से  5 या 6  वर्ष तक की अवस्था " का माना  जाता है। इस अवस्था में प्रारंभ  के तीन - 3 वर्ष में यानी कि - पूर्व शैशवावस्था  में  बालक का विकास - ( शारीरिक विकास और मानसिक विकास ) बहुत ही तीव्र गति से होता है। 
पूर्व शैशवावस्था - 🔻 ( जन्म से तीन वर्ष _)
शैशवावस्था
 शैशवावस्था -  🔻 ( तीन वर्ष से छै वर्ष)

➣  इस अवस्था में बालक का शारीरिक विकास और मानसिक विकास बहुत ही तीव्र गति से होता है।  साथ ही अवस्था में बालक में कुछ प्रमुख प्रवत्तियाँ पायी जाती है। 
 जैसे कि -  अनुकरण करने की प्रवत्ति , किसी दूसरे के शब्दो को वैसे का वैसा ही दोहराने की प्रवत्ति , जिज्ञासा की प्रवत्ति होना , भाषा को सीखना अथवा सीखने की कोशिश करना। इसके साथ ही साथ इस अवस्था में बालक की - समाजीकरण होना भी आरम्भ हो जाता है।  
 अनुकरण  करने की प्रवत्ति  ⬇
शैशवावस्था
  जिज्ञासा  करने की प्रवत्ति  ⬇
शैशवावस्था
 भाषा को सीखने की प्रवत्ति  ⬇
शैशवावस्था
 समाजीकरण की प्रवत्ति  ⬇
शैशवावस्था

शिक्षा की दृस्टि से शैशवावस्था -  शैशवावस्था  को शिक्षा की दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण समझा जाता है।  कियोकि इस अवस्था में ही बालक के विकास की नीव और शिक्षा की नीव पड़ती है।  इस लिए बालविकास में इस अवस्था को शिक्षा की दृस्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। 


2 - बाल्यावस्था -    " बाल्यावस्था  " का समयकाल  - 6 वर्ष से 11 या 12 वर्ष तक " माना जाता है।  इसका  प्रथम चरण यानी कि  - पूर्व बाल्यावस्था - (  6 वर्ष से 9 वर्ष ) तक का होता है।  इस अवस्था  में बालको की लम्बाई एवं भार दोनों बहुत तेज़ी के साथ बढ़ते  है। साथ ही इस अवस्था में बालको में तर्क करने की क्षमता का विकास होने लगता है।  इस अवस्था में बालको के सीखने की गति - शैशववस्था से तो धीमी रहती है , परन्तु बालको के सीखने का जो क्षेत्र अथवा दायरा होता है , वह शैशववस्था की तुलना में बढ़ जाता है। 
अतः इस अवस्था में - बालको की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।  जिससे कि - बालको की बौद्धिक क्षमता का सही रूप में विकास हो पाए। 
इस अवस्था की विभिन्न विशेषताए इस प्रकार है। 

 बाल्यावस्था

किशोरावस्था

 किशोरावस्था का समयकाल - "  12 वर्ष से 18 वर्ष तक " का मन जाता है। इस अवस्था में जो पूर्व किशोरावस्था होती है। लगभग - 12  वर्ष से 14  वर्ष तक की - उसमे बालको की लम्बाई और भार बढ़ने की तुलना में बालिकाओ की लम्बाई और मांसपेसिया बहुत तेजी से बढ़ती है। अर्थात इस अवस्था में ( पूर्व किशोरावस्था ) में बालिकाओ ( किशोरियों ) की लम्बाई और भार में तेज़ी से वृद्धि एवं विकास देखा जाता है। 

किशोरावस्था
ठीक इसके विपरीत उत्तर- किशोरावस्था जो कि - 14 वर्ष की उम्र से 18 वर्ष तक की होती है , उसमे बालिकाओ की अपेक्षाकृत बालको की लम्बाई और मासपेशियों में तेज़ी से वृद्धि देखि जाती है। 

किशोरावस्था

➣ साथ ही इस अवस्था की निम्नलिखित विषताएँ होती है , जो कि  इस प्रकार है। 
(1 ) बुद्धि का पूर्ण विकास होना - बालक एवं बालिकाओ की बुद्धि का पूर्ण विकास इस अवस्था में ही होता है।  इसके साथ ही उनमे स्मरण शक्ति या क्षमता पहले से अधिक तेज़ी से विकसित हो जाती है।  अब उन्हें ध्यान लगाने के लिए अधिक प्रयत्न नहीं करने पड़ते है। इस अवस्था में बालक बहुत ही शीघ्र और बहुत तेज़ी से किसी बात समझ कर उस पर प्रतिक्रिया करते है।  
किशोरावस्था
(ii ) सामाजिक जीवन का बढ़ना -  इस अवस्था में बालक के सामाजिक जीवन में बड़ा बदलाव देखा जाता है।  जिसमे बालक की प्रवत्ति -   में दोस्त बनाना और दोस्ती को जी जान से निभाने की कोशिश करना पाया जाता है।  अतः इस अवस्था में बालक नए - नए दोस्त बनाता है।  इस प्रकार इस अवस्था में  बालक के समाजिक क्षेत्र बढ़ता है।  इस अवस्था में अभिभावकों को विशेष ध्यान देने की जरुरत होती है।  
किशोरावस्था

(iii ) नशा , अपराध की समस्या -  इस अवस्था में बालको के जीवन  में नशा , अपराध एवं विभिन्न तरह की समस्याओं को भी पाया जाता है। अतः  इस अवस्था में यदि बालको पर ठीक से ध्यान ना दिया जाए तो बालक -बुरी संगत  अथवा बहकावे में आकर - " नशे की लत " में पड़  जाते है , और अपने जीवन को नर्क से भी बदत्तर बना लेते है।  इस प्रकार इस अवस्था में हमे बालको को विशेष ध्यान  देने की जरुरत होती है।  



(iv)- तूफानी अवस्था  -       किशोरावस्था को जीवन की "तूफानी अवस्था " भी कहते है।  कियोकि  इस अवस्था में बालक की मानसिक और शारीरिक स्थति और गतिविधिया " तूफ़ान " की तरह होती है।  यदि ऐसे समय में बालक को सही मार्गदर्शन ना मिले तो वो गलत संगत अथवा जानकारी की कमी के कारण - गलत दिशा में मुड़ जाता है। इसलिए इस अवस्था में बालक पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में निर्णय बिना सोचे - समझे लेने , परवाह ना करने , दूरगामी परिणाम ना देख पाने के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता है।  इसलिए अभिभावकों को चाहिए की इस अवस्था में बालको  अकेलेपन के शिकार  होने दे ,  और समय - समय मार्गदर्शन करते रहना चाहिए।  इस अवस्था में बालको को तेज गुस्सा आना और फिर एक दम शांत हो जाना भी आम होता है। साथ ही इस अवस्था में बालको  के मित्रो ,आहार - व्यवहार आदि पर विशेष नजर रखना  चाहिए।  



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