अमानक वर्ण

अमानक वर्ण   Hindi grammar questions  for competitive exam  part-5   1  शुद्ध वर्तनी    2 . अमानक वर्ण   (i)  - शुद्ध वर्तनी ➨ बर्तन की शुद्ध " वर्तनी " क्या है ?   बर्तन का शुद्ध वर्तनी ➨ "बर्तन " का शुद्ध वर्तनी   "बरतन " है ∣   (ii) . अमानक वर्ण - हिंदी में बहुत से ऐसे वर्ण हुआ करते थे ,जो की वर्तमान समय में चलन में नहीं है ,अथवा हिंदी के मूल वर्णो में शामिल नहीं है।  इस प्रकार के  सभी वर्ण " अमानक वर्णो " की श्रेणी में  आते हैं Ι  अर्थात वे   " वर्ण " जो पूर्व में तो मान्य रहे हो ,परन्तु वर्तमान वर्णमाला के दृस्टीकोण   से मान्य न  होते हो , अमानक वर्ण है ।     अमानक वर्ण क्या है ➨ ऐसे वर्ण जिनका कोई " मानक " न हो , तथा जो सर्वमान्य न हो " अमानक " वर्ण है , अथवा ऐसे वर्ण जिनका पहले तो मानक रहा हो परन्तु वर्तमान समय में उनका कोई " मानक " न  हो अमानक वर्ण कहलाते है ।   अमानक वर्ण किसे  कहते है ➨ जब कोई वर्ण वर्तमान परिपेक्ष्य  के मानकों  पर खरा नहीं उतरता अथवा

child development and pedagogy notes in hindi

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Facts - Only 
child development and pedagogy notes in hindi
Part - 1
1 -  वॉटसन के अनुसार - " मनोविज्ञान  - व्यवहार का विज्ञान है " ।
2 - मनोविज्ञान में " व्यवहार के अध्ययन " की 3 (तीन) प्रमुख  क्रियाओ को शामिल किया जाता है ।
जो की निम्नलिखित है।
(i ) -  व्यवहार में परिवर्तन होना ।
(ii  ) -   व्यवहार को अच्छी तरह से समझना ।
(iii ) - व्यवहार - को देखकर उसके लिए " भविष्यवाणी " करना । आदि विभिन्न प्रकार के तथ्यों का अध्ययन - हम " मनोविज्ञान " के अंतरगर्त करते है ।

3 - मन ➜   सामन्य भाषा में कहे - मनोविज्ञान - " मन का विज्ञान " है । परन्तु इस तथ्य पर " भारतीय दर्शन शास्त्र " के मनोविज्ञानिकों और - " पाश्चात्य  मनोविज्ञानिकों " में  विरोधाभास है ।


भारतीय - मनोविज्ञानिकों के अनुसार - " मन " - हमारे - ह्रदय के भीतर स्थित होता है । ,  जबकि - पश्चिमी मनोविज्ञानिकों - के अनुसार - " मन " -  हमारे - "मस्तिष्क " के भीतर स्थित होता है । अतः इस प्रकार भारतीय मनोविज्ञानिकों और  पास्चत्य मनोविज्ञानिकों में ये - "मतान्तर " है ।

4 - परा.मनोविज्ञान क्या है ?
परामनोविज्ञान ➔ " परामनोविज्ञान " के अंतरगर्त - " चमत्कारिक क्रिया - कलाप " से सम्बंधित  विषयो का अध्ययन किया जाता है ।  जैसे कि - " पूर्व जन्म की स्मृति " का होना ।

5 - शिक्षा मनोविज्ञान क्या है ?
शिक्षा मनोविज्ञान  ➔ शिक्षा शब्द  संस्कृत  भाषा के " शिक्ष " धातु से बना है । जबकि  "एजुकेशन " शब्द - लेटिन भाषा  के  - " एडुकेयर " शब्द से बना है , जिसका अर्थ होता है कि  - "नेतृत्व करना ।  शिक्षा-मनोविज्ञान वह विज्ञान है , जिसमे कि प्रमुख रूप से  - दो  - बिन्दुओ का अध्ययन किया जाता है । 
  शिक्षा मनोविज्ञान  - " मनोविज्ञान " की ही एक शाखा है । जिसकी  की उत्पत्ति  - 1900  की मानी जाती है । मनोविज्ञान की शाखा - "शिक्षा मनोविज्ञान " के अंतरगर्त - शिक्षण और  अधिगम को शामिल किया जाता है ।
वही - "प्लेटो " ने शिक्षा को - " शाररिक - मानसिक - तथा बौद्धिक विकास " की प्रक्रिया माना है। 
(i  ) शिक्षण  - शिक्षण से तात्पर्य है कि  - " बालक की शिक्षा किसी और किस प्रकार होगी , या होती है।  एवं इसमें किन - किन आयामों को शामिल किया जाता है आदि तथ्य एवं वे सभी तथ्य जो कि  - बालक की शिक्षा सम्बन्ध में विभिन्न तरह से स्पस्टीकरण करते हो।  आदि अध्ययन किया जाता है।  
 शिक्षण
  ( ii ) अधिगम  -   सामान्य भाषा  अधिगम का अर्थ होता है - " सीखना " अर्थात जब बालक के द्वारा कुछ नया  सीखा जाता है , तो - उससे हम  बाल -विकास  या शिक्षा विजान की भाषा के अंतरगर्त - " अधिगम " कहते है। 


6 - मनोविज्ञान के अनुसार - मानव का व्यवहार दो प्रकार का होता है । जिसमे पहला व्यवहार होता है - हमारा - " बाह्य व्यवहार "  और दूसरा होता है -  हमारा - " आंतरिक व्यवहार " ।

(i ) बाह्य व्यवहार -   बाह्य व्यवहार से तात्पर्य उस व्यवहार से होता है , जिसे प्रत्यक्ष रूप से देख सकते है । अर्थात ऐसा व्यवहार जिसे हम - देख पाए  या ऐसा व्यवहार जो हमे बाहरी रूप से दिखाई दे , उसे हम मानव का "बाह्य व्यवहार " कहते है । 
उदाहरण के लिए - -  रोना , हंसना  , चिल्लाना  आदि आते है ।
बाह्य व्यवहार

(ii ) आंतरिक  व्यवहार -    आंतरिक व्यवहार ऐसा व्यवहार होता है ,  जिसे हम " प्रत्यक्ष " रूप में नहीं देख सकते है I  अर्थात ऐसा व्यवहार जो बाहरी रूप से दिखाई ना दे , या जिसे हम देख न पाए , ऐसा व्यवहार -  " आंतरिक व्यवहार " कहलाता है ।
उदाहरण के लिए - रक्तचाप होना ( blood - pressure ) - , भय होना , चिंता  होना , आदि आते है।

आंतरिक  व्यवहार

7- महात्मा गांधी के अनुसार -  " शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक को मनुष्य के शरीर ,मन , आत्मा के सर्वाग्रींण  एवं सर्वोत्तम  विकास से है।  "

8 - मनोविज्ञान और शिक्षा मनोविज्ञान में अंतर  -  मनोविज्ञान और  शिक्षा  मनोविज्ञान  में निम्नलिखित अंतर या भिन्नता है , जो कि इस प्रकार है ।
मनोविज्ञान और शिक्षा मनोविज्ञान में अंतर
अन्तर - 
1  -  मनोविज्ञान अपने आप में एक स्वतंत्र विषय है। , जबकि - "शिक्षा मनोविज्ञान " मनोविज्ञान की ही एक शाखा है। 
2 -  मनोविज्ञान का क्षेत्र बड़ा एवं विस्तृत है , वही - " शिक्षा मनोविज्ञान " का क्षेत्र सीमित है। 
3 - मनोविज्ञान का कार्य उन सभी विषयो अथवा क्षेत्रों के व्यवहार के अध्ययन को समझना , अथवा नियंत्रण करना अथवा - भविष्यवाणी करना है ।
4 - मनोविज्ञान के विस्तृत क्षेत्र में उन सभी तथ्यों का अध्ययन किया जाता है , जो कि उसके अंतरगर्त आते है , जबकि - "शिक्षा मनोविज्ञान " में  " शिक्षा " से सम्बंधित - परिस्थतियों , क्रियाओं , प्रतिक्रियों आदि का अध्ययन किया जाता है ।



9 - वृद्धि और विकास में क्या अंतर है ?
9 - वृद्धि और विकास में अंतर  -  वृद्धि और विकास में निम्नलिखित अंतर है , जो इस प्रकार है ।

वृद्धि और विकास में अंतर

विकास -   विकास आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है।    विकास का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है।  जिसमे हमारे सपूर्ण विकास के क्षेत्र को शामिल किया जाता है।  जिसमे हमारा - शारीरिक विकास और मानसिक विकास दोनों आते है।  विकास अपने आप एक विस्तृत अर्थ को लिए हुए है । विकास के अंतरगर्त - " वृद्धि " एक छोटा सा भाग है । या ये कहे कि - " वृद्धि " ही विकास के अंतरगर्त आती है ।
वृद्धि  -  वृद्धि  हमारे विकास की प्रक्रिया के अंतरगर्त होने वाली एक - छोटा सा भाग है।  जिसमे  केवल  " वृद्घि " को ही शामिल किया जाता है।  वृद्धि का समयकाल एक निश्चित होता है , अर्थात वृद्धि एक निश्चित समय तक ही होती है।  अर्थात - संपूर्ण विकास में होने वाला एक छोटा सा भाग है। 

⇀ विकास के अंतगर्त -  -  कार्य कुशलता , कार्य क्षमता , व्यवहार आदि  विभिन्न प्रकार की क्रियाओ को शामिल किया जाता है। 
जबकि वृद्धि के अंतरगर्त -  बालक के आकार का बढ़ना , लम्बाई का बढ़ना आदि विभिन्न तथ्यों को शामिल किया जाता है। 

⇀ विकास एक ऐसी प्रक्रिया है , जो कि  व्यक्ति के जीवन में " जीवन -पर्यन्त " चलती रहती है। कभी भी रूकती नहीं है , जब तक मनुष्य जीवित रहता है ,तब तक विकास की क्रिया चलती रहती है।  
जबकि " वृद्धि " एक निश्चित समय काल तक ही चलती है ।  अर्थात वृद्धि विकास की तरह कभी भी जीवन भर नहीं चलती है।  वृद्धि की एक निश्चित समय सीमा या समय काल होता है। 

⇀ विकास के अंतगर्त " वृद्धि " की सभी क्रियाओ को शामिल करते है , जबकि  " वृद्धि " होने का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं होता है , कि  उसमे " विकास " भी हो रहा है।  कियोकि  वृद्धि का दायरा सीमित है , जबकि विकास का दायरा विस्तृत है। 
मानसिक विकास

10 - मानसिक विकास ⇀ मानसिक विकास एक ऐसा विकास होता है , जो निरंतर चलता रहता है।  अर्थात जैसा की - हम जानते है कि  - हमारे शारीरिक विकास की एक समय सीमा अथवा काल होता है , जिसके बीच में ही शारीरिक विकास होता है , या ये कहे की एक निश्चित समय तक ही हमारा शारीरिक विकास होता है। 
जबकि हमारा मानसिक विकास निरंतर चलता रहता है। 
मानसिक सा मनो शाररिक विकास के अंतरगर्त - विभिन्न तरह के अन्य विकास को भी शामिल किया जाता है। 
जैसे कि  -
 ⇀मानसिक विकास होना। 
⇀  सामाजिक विकास होना। 
⇀  सामाजिक विकास होना। 

11 - इसके अलावा यदि हम भारतीय - मनीषियों की बात करे , तो हम देखते है कि भारतीय मनीषियो ने - " मानव विकास को 7 (सात ) भागो में विभाजित किया है।  जो क़ि इस प्रकार है। 


भारतीय मनीषियो अनुसार 
(i )  गर्भावस्था - इसके अंतरगर्त - " गर्भाधान से जन्म तक " के समय काल को शामिल किया जाता है। 
 (ii ) शैशववस्था   - इसके अंतरगर्त - " जन्म  से 5 वर्ष तक " के समयकाल को शामिल किया जाता है। 
(iii )  बाल्यावस्था - इसके अंतरगर्त - " पांच वर्ष से 12 वर्ष तक " के समयकाल को शामिल किया जाता है। 
(iv ) किशोरावस्था - इसके अंतरगर्त - " 12 वर्ष से 18 वर्ष तक " के समय काल को शामिल किया जाता है। 
(v ) युवा वस्था - इसके अंतरगर्त - " 18  वर्ष से 25 वर्ष तक " के समयकाल को शामिल किया जाता है। 
(vi ) प्रौढ़ावस्था - इसके अंतरगर्त  - " 25 वर्ष से 55 वर्ष तक " के समय काल को शामिल किया जाता है। 
(vii )  वृद्धावस्था - इसके अंतरगर्त - " 55 वर्ष से मृत्यु तक " के समयकाल को शामिल किया जाता है। 



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